मुना चौधरी
सठनी रजनी बेटीके बियाहमे साठै छै
सठनी ने वर माङ्छै ने कनिया
आपन मलोगसे दैछै मैया, बाबु
यी दहेज नै चियै
चियै एकटा संस्कार या परम्परा।
बेटीके साठैत सठनी रजनी
कानैछै मैया, बाबु
घरसे बिदाह हैछै बेटी
लोरसे आइख भोरल छै सैबके
बेटीके फुल जेखा पाल्ने छेलै
से बेटीके सठनी रजनी साठैत
बिदाह करैछै बाबु,मैया ।
बेटीके बियाहमे दैछै
भरावर्तन, अलमारी, पलङरी चौकी
सिरक, दसना, तन्ना, पटिया,
दौरा, धमा, ढकिया, गाई, भैँसी, धान, चौर,
तेकरा कहैछै सठनी रजनी ।
कहैछै बेटीसब हमरा सठनी रजनी नै दे
दे हमरा शिक्षा
सठनी रजनी दुई चाइर वरीसके वाद
टुइट, फुइट जेतै, बिज लाइग जेतै
घुन लाइग जेतै, पुरान भ्याजेतै
सठनी रजनीके सट्टा दे शिक्षा
जे शिक्षासे हम हम काइल कम्या कोइरके खाइले सकबै
आपन जीवन सहज तरिकासे चलाइले सकबै ।
दे हमरा संस्कार
जै संस्कारसे हम परिवारके एक छाइनके तरमे
मिल्याके राइख सकबै ।
आपन जीवन या घरके स्वर्ग बन्याके राइख सकबै
शिक्षा या संस्कारसे बरका बेटीके लेल
नै छै कोनो सठनी रजनी ।
सठनी रजनीके सट्टा हमरा
मृदूभाषी,
सरल, दुरगामी,
सौम्य, शक्तिशाली
बन्या दे ।