संघीयता की ज्योति

चन्द्रकिशाेर

चन्द्रकिशाेर

मधेश की माटी ने जब आवाज़ उठाई,
न्याय की खातिर अग्नि सी जलाई।
पीड़ा को शब्दों में ढाला गया,
इतिहास का रुख ही बदल डाला गया।

जो दबे थे, वे अब बोले हैं,
अपना हक़, अपनी बात खोले हैं।
संघीयता बना वो पुल आज,
जहाँ हर कोना पाए समाज।

पहाड़ी, मधेशी, जनजाति स्वर,
अब गूंजे संग, बने एक लहर।
समावेशी सोच की चली है हवा,
भेदभाव की चट्टानों को बहा।

यह परिवर्तन केवल सत्ता नहीं,
यह चेतना की नयी कथा रही।
जहाँ सबका सम्मान हो समान,
वही है सच्चा लोकतंत्र महान।

अब कोई भी न तोड़ सकेगा,
इस एकता को न मोड़ सकेगा।
अखंड नेपाल की यह तस्वीर,
बनी है बलिदान, संघर्ष से वीर।

संघीयता मधेश का उपहार है,
जो सबको एक सूत्र में संवार है।
अब कोई भी नहीं इसे हर सके,
यह भाव, यह देश—अमर रहे!

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