मानव का जन्म मिला तो ।
मानवता का विस्तार करो।।
मानवता का संहार करो।।
सकल जगत का हो भला।
मन मे ऐसे उदगार धरो।
धरती माता को न यूँ तुम।।
रक्त से फिर लाल करो।
सकल जगत में भाईचारा।।
देशहित हो सबसे प्यारा।
मानव का मानव से होगा।।
तब अंकुरित प्रेम उजाला।
विषम परिस्थिति में न छोड़ो।।
धैर्य का तुम यूँ आँचल।
बढ़ कर आगे तुम चलो।।
बन के दीपक सा उजियारा।
सुलग न पाए आग फिर कही।।
ईर्ष्या द्वेष वैमनष्य की फिर।
तुम शीतल जल बन कर फिर ।।
हर ह्रदय की पीर हरो।
अब ना दनुज कोई हो पाए।।
मानव हो मानव से प्यार करो।
आपस की तकरार न भली।।
करना है तो स्नेह बार बार करो।
आकांक्षा द्विवेदी बिंदकी फतेहपुर