चन्द्रकिशोर
भैंस की पीठ पर बैठा एक बालक
खेतों की धूप में डोलता था,
पर उसकी आँखों में
किसी और दुनिया की छाया होती थी।
हाथ में खुली किताब
जैसे धरती पर रखा
आकाश का एक टुकड़ा।
भैंस घास चरती रहती,
और मैं शब्दों की चरागाह में भटकता
कभी किसी विचार की नदी पार करता,
कभी किसी कथा के जंगल में खो जाता।
तभी शायद
मेरे भीतर एक अदृश्य भूख जन्मी
ज्ञान की, अर्थ की, और अर्थ के पार की।
वक्त के साथ
घर बदले, शहर बदले,
भाड़े की दीवारों ने कई बार
मेरी किताबों को बक्सों में कैद किया।
पर किताबें कैद कहाँ होती हैं
वे तो भीतर की खिड़कियाँ खोल देती हैं।
आज अपने घर में भी
किताबें इधर-उधर फैली हैं
किसी मेज़ पर, किसी कुर्सी पर,
बिस्तर के बगल में
जैसे रात के अँधेरे में
छोटे-छोटे दीपक रखे हों।
कभी-कभी सोचता हूँ
यह जो लोग संपत्ति कहते हैं,
वह दरअसल क्या है?
मिट्टी, ईंट और दीवारों का जोड़?
या वह जो
मन को थोड़ी और रोशनी दे सके?
मेरे लिए
किताबें ही वह रोशनी हैं
जिनमें दुनिया भी है
और दुनिया से प्रश्न करने का साहस भी।
शायद इसीलिए
यदि किसी घर में किताबें न हों,
तो मुझे लगता है
जैसे वहाँ हवा कम है।
और बिना शब्दों की उस हवा के
मैं शायद
सो भी न सकूँ।
क्योंकि मेरे लिए
किताबें केवल काग़ज़ नहीं
वे मेरी यात्राएँ हैं,
मेरे संवाद हैं,
और मेरे भीतर बसती
एक अनंत दुनिया की चुप धड़कन हैं।