मैं और मेरी लोटकी

 

चन्द्रकिशोर

बचपन की धूप में
एक छोटा-सा चमकता पात्र
मेरी लोटकी।
नानाजी शहर गए थे उसे लाने,
रास्ते में साइकिल पलट गई,
हाथ टूट गया उनका
जैसे समय ने
उनकी इच्छा को रोकना चाहा हो।
महीना भर दर्द के साथ
दिन धीरे-धीरे बीते,
पर एक दिन
वे मुस्कुराते हुए लौटे
हाथ में वही छोटी-सी लोटकी,
जिस पर अंकित था
मेरा नाम।
तब समझ नहीं पाया था
कि वह केवल एक जलपात्र नहीं,
नानाजी के प्रेम का आकार था
छोटा, पर गहरा।
हर छोटी जरूरत में
वही लोटकी साथ रहती,
जैसे नानाजी की छाया
मेरे पीछे-पीछे चलती हो।
आज नानाजी नहीं हैं,
पर लोटकी अभी भी है
शांत, स्थिर,
समय की तरह चुप।
जब-जब उसे छूता हूँ,
उसकी धातु की ठंडक में
नानाजी की हथेली की गर्माहट मिलती है।
जैसे वह अब भी कह रहे हों—
“पानी पी लो बौआ।”
धीरे-धीरे समझ आया
मनुष्य चला जाता है,
पर उसका स्नेह
किसी वस्तु में ठहर जाता है।
मेरे लिए
यह छोटी-सी लोटकी
सिर्फ पानी नहीं देती
यह स्मृति का अमृत है,
नानाजी का आशीष है,
और वह मौन दर्शन भी
कि प्रेम का आकार छोटा हो सकता है,
पर उसका अर्थ
समय से भी बड़ा होता है।

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