डॉ शेफालिका वर्मा
मुट्ठी भर धूप की तलाश में
अट्टालिकाओं की छाँव में
नदी के तीर पर जैसे
प्यासी खड़ी थी
आकाश में सूरज हँस रहा था —
मै तो अपनी सारी तेज के साथ
तुम्हे आलोकित कर रहा हूँ
पर तुम जितना मुझे
ग्रहण कर सको
जितनी तुम्हारी क्षमता हो !
कभी कभी तो
गगनचुंबी इमारतों से
गिरती पड़ती
पेड़ों के पत्तों में उलझी
तुम तक पहुंचने में ही बीमार हो जाती हूँ !
इन आकाशीय इमारतों में
रहने की लिप्सा ने
तुम्हे प्रकृति की कितनी सुविधाओं से
वंचित कर रखा है
कभी तुमने सोचा है ?
इसमें मेरा क्या दोष है ?
और मैं घबड़ा गयी
धूप के इस प्रश्न का कोई जबाब नहीं था
क्या सच ही हम
अपना ही सोचते रहे ?????