कविता : ‘युवाओं तुम जागो’

गार्गी सेठ

 

लडते हैं हम इनके नाम से
कभी जाति कभी बोली
कभी धर्म कभी भाषा
क्या यही है एकाग्रता की परिभाषा ?
तुम जागो…

कहते तो हैं “हम एक हैं”
पर इस ‘एक’ का क्या हिस्सा हम हैं?
दुनिया को प्यार और भाईचारे का पाठ हम पढ़ाते हैं
पर अपनों को अपनाने से हम कतराते हैं
तुम जागो…

क्या विविधता में एकता बस एक सोच है
कब तक हम सोए रहेंगे
हमें आपस में लड़ाकर, लोग अपने इरादों को पूरा करते रहेंगे
तुम जागो…

मेरे देश की युवा पीढ़ी
अब तो तुम निद्रा से जागो
भेदभाव के इस दलदल से निकलो
अब टुकड़ो में खुद को ना बांटो।
तुम जागो …

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