
चन्द्रकिशोर
तीस बरस तक
एक किराए के घर में रहा मैं
पर समय की लंबी नदी में
वह घर धीरे-धीरे
मेरी ही स्मृतियों का किनारा बन गया।
दीवारें किसी और की थीं,
पर उन पर टंगी थी
हमारी हँसी की तस्वीरें।
छत मकान मालिक की थी,
पर उसके नीचे
मेरे बच्चों के सपनों ने
पहली बार उड़ना सीखा।
मेरे बेटे के लिए
वही घर “अपना घर” है,
जहाँ उसके बचपन की आवाज़
अब भी सीढ़ियों पर गूंजती होगी।
और मेरी पत्नी ने
उसी छोटे से आँगन में
जीवन के इन्द्रधनुषी रंगों से
एक पूरा कैनवास रचा था।
अजीब बात है—
मकान किसी और का था,
पर मोहल्ले में लोग
उसे मेरे नाम से पहचानते थे।
जैसे उस घर की दीवारों में
मेरे संघर्ष की धड़कन
धीरे-धीरे बस गई हो।
वहीं कहीं
मेरे सपनों ने आकार लिया,
वहीं उम्मीदों ने
पहली बार गुरुत्व पाया।
वह घर
सिर्फ ईंट और पलस्तर नहीं था
वह मेरी जिंदगी का
एक शांत, अनलिखा अध्याय था।
आज भले
उस घर की चाबी
मेरे पास नहीं है,
पर उसकी दहलीज़ पर
मेरे कदमों की आहट
अब भी रहती होगी।
क्योंकि
कुछ घर किराए के होते हैं,
पर समय के साथ
वे दिल में
हमेशा के लिए
अपना पता लिख जाते हैं।